नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने चाइल्ड ट्रैफिकिंग (बाल तस्करी) के बढ़ते मामलों पर सख्त रुख अपनाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार और इलाहाबाद हाईकोर्ट को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने राज्यों को बाल तस्करी रोकने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए और देशभर की निचली अदालतों को आदेश दिया कि चाइल्ड ट्रैफिकिंग से जुड़े मुकदमों का निपटारा छह महीने के भीतर किया जाए। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने स्पष्ट किया कि इन मामलों की सुनवाई दिन-प्रतिदिन होनी चाहिए।
कोर्ट की नाराजगी उस समय सामने आई जब एक मामले में तस्करी कर लाए गए बच्चे को यूपी के एक दंपति को सौंप दिया गया था, जो बेटा चाहते थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि कोई व्यक्ति जानबूझकर चोरी किए गए बच्चे को खरीद ले, चाहे उसकी मंशा संतान पाने की ही क्यों न हो। कोर्ट ने आरोपी की जमानत रद्द करते हुए कहा कि यह देशव्यापी बाल तस्करी गिरोह है, जिसके चुराए गए बच्चे पश्चिम बंगाल, झारखंड और राजस्थान से बरामद हुए हैं।
इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकारों से कहा कि नवजात बच्चों की चोरी की घटनाओं को गंभीरता से लें और यदि किसी हॉस्पिटल से नवजात की चोरी होती है, तो तुरंत उस हॉस्पिटल का लाइसेंस रद्द किया जाए। वाराणसी और आसपास के अस्पतालों में नवजात चोरी के मामलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा 2024 में दी गई जमानत को चुनौती न देने पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की आलोचना की। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय इंस्टीट्यूट ऑफ डेवेलपमेंट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से रिपोर्ट मंगवाई और उसके सुझावों को अपने फैसले का हिस्सा बनाया। कोर्ट ने सभी माता-पिता को सलाह दी कि वे अस्पतालों में अपने नवजात बच्चों की सुरक्षा को लेकर अधिक सतर्क रहें।
यह ऐतिहासिक फैसला न केवल चाइल्ड ट्रैफिकिंग से निपटने की दिशा में एक मजबूत कदम है, बल्कि यह राज्य सरकारों और न्यायपालिका को इन संवेदनशील मामलों पर और अधिक जिम्मेदारी के साथ काम करने की चेतावनी भी है।


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