नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में वक्फ संशोधन मामले की सुनवाई से पहले नए कानून के समर्थन में लगातार आवेदन दाखिल किए जा रहे हैं। हाल ही में आदिवासी संगठनों ने इस कानून को आदिवासियों के हित में बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखने की मांग की है। जय ओमकार भीलाला समाज संगठन और आदिवासी सेवा मंडल जैसी संस्थाओं ने नए आवेदन दाखिल किए हैं।
नए वक्फ संशोधन कानून की धारा 3E अनुसूचित जनजाति के लोगों की जमीन को वक्फ संपत्ति घोषित करने पर रोक लगाती है, और आदिवासी संगठन इसे अपने समुदाय के हितों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण प्रावधान मानते हैं। उनका कहना है कि संविधान निर्माताओं ने आदिवासियों की जमीनों की सुरक्षा के लिए विशेष ध्यान दिया था, जिसके तहत कई राज्यों में ऐसे कानून बनाए गए हैं जो आदिवासियों की भूमि के गैर-आदिवासियों को ट्रांसफर पर रोक लगाते हैं।
आदिवासी संगठनों का यह भी कहना है कि वक्फ कानून, 1995 में वक्फ बोर्ड को अत्यधिक शक्ति दी गई थी, जिसका दुरुपयोग करते हुए वक्फ बोर्ड ने कई बार आदिवासियों की जमीनों पर कब्जा किया। नए वक्फ संशोधन कानून के जरिए केंद्र सरकार ने आदिवासी समाज के हितों को प्राथमिकता दी है, जो लंबे समय से आवश्यक महसूस हो रहा था।
इस नए कानून के खिलाफ कांग्रेस, आरजेडी, एसपी, टीएमसी, डीएमके, AIMIM जैसे राजनीतिक दलों और मुस्लिम संगठनों ने याचिकाएं दाखिल की हैं, जिसमें इसे मुस्लिम विरोधी और भेदभावपूर्ण बताया गया है। अब तक 20 से अधिक याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं। इस मामले की सुनवाई 16 अप्रैल को चीफ जस्टिस संजीव खन्ना की अध्यक्षता में 3 जजों की बेंच करेगी। इससे पहले नए कानून के समर्थन में भी कई आवेदन दाखिल हो चुके हैं, जिनमें 7 राज्य सरकारों और अन्य संगठनों ने इसे संविधान सम्मत और न्यायपूर्ण बताया है। केंद्र सरकार ने भी कैविएट दायर कर अपना पक्ष रखने की मांग की है।


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