नई दिल्ली: विदेश मंत्रालय (MEA) के एक हालिया स्पष्टीकरण ने देश में नागरिकता के दस्तावेजों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। मंत्रालय ने साफ किया है कि भारतीय पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज (Travel Document) है, जिसे नागरिकता का अंतिम या निर्णायक सबूत नहीं माना जा सकता। इस बयान के बाद आम जनता और राजनीतिक हलकों में यह सवाल तेजी से उठने लगा है कि यदि देश का सबसे प्रतिष्ठित दस्तावेज भी नागरिकता की अंतिम गारंटी नहीं है, तो फिर एक आम नागरिक अपनी भारतीयता कैसे साबित करेगा।
क्या कहता है देश का कानून और पुरानी व्यवस्था?
सरकार के अनुसार, पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिकों को ही जारी किया जाता है, लेकिन इसका प्राथमिक उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय यात्रा को आसान बनाना और विदेशों में पहचान स्थापित करना है। यह कानूनी स्थिति कोई नई नहीं है, बल्कि लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था का हिस्सा है। साल 2013 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी अपने एक फैसले में स्पष्ट किया था कि किसी व्यक्ति के पास पासपोर्ट होने मात्र का यह मतलब नहीं है कि वह भारत का नागरिक ही है। कोर्ट ने भी इसे नागरिकता के अंतिम सबूत के तौर पर मानने से इनकार कर दिया था, जिसे अब विदेश मंत्रालय ने दोबारा दोहराया है।
दस्तावेजों का फेर और नागरिकता साबित करने का आधार
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में नागरिकता मुख्य रूप से जन्म, वंश, पंजीकरण, प्राकृतिककरण (Naturalisation) या किसी नए क्षेत्र के भारत में विलय के आधार पर तय होती है। हालांकि ‘नागरिकता प्रमाणपत्र’ (Citizenship Certificate) को इसका सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण माना जाता है, लेकिन यह हर आम नागरिक को जारी नहीं किया जाता। सरकार का कहना है कि नागरिकता का निर्धारण किसी एक अकेले दस्तावेज से नहीं, बल्कि संबंधित कानूनी प्रावधानों और उपलब्ध साक्ष्यों के समग्र मूल्यांकन के आधार पर किया जाता है।

