नई दिल्ली: मानसून की पहली ही तेज बारिश के बाद दिल्ली-एनसीआर, विशेष रूप से गुरुग्राम में भारी जलभराव और घंटों लंबे ट्रैफिक जाम ने एक बार फिर यहाँ के बुनियादी ढांचे की पोल खोल दी है। इस गंभीर स्थिति पर चिंता जताते हुए शहरी नियोजन विशेषज्ञों का साफ कहना है कि यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि पूरी तरह से मानव-निर्मित समस्या है और खराब शहरी योजना (टाउन प्लानिंग) का नतीजा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में औसतन 500 से 650 मिमी ही वार्षिक वर्षा होती है, जबकि देश के कई ऐसे शहर हैं जहाँ इससे कई गुना ज्यादा बारिश होने के बावजूद जल निकासी का प्रबंधन कहीं बेहतर है। हाल ही में गुरुग्राम में महज 33 घंटों के भीतर 115 मिमी से अधिक बारिश दर्ज की गई, जिससे प्रमुख सड़कें समंदर बन गईं, गाड़ियां पानी में तैरती दिखीं और ट्रैफिक इस कदर थमा कि पुलिस को कंपनियों के लिए ‘वर्क फ्रॉम होम’ तक की सलाह जारी करनी पड़ी।

इस बदहाली की मुख्य वजहों पर रोशनी डालते हुए आर्किटेक्ट और एक्सपर्ट्स बताते हैं कि गुरुग्राम का विकास बेहद उलटे और अनियोजित तरीके से हुआ है, जहाँ गगनचुंबी इमारतें और कंक्रीट का जाल पहले बिछा दिया गया, जबकि सीवरेज, ड्रेनेज और सार्वजनिक परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं की प्लानिंग बाद में की गई।

अतीत में गुरुग्राम के पास खुले मैदान, कृषि भूमि, प्राकृतिक नाले और तालाब हुआ करते थे, जो बारिश के पानी को सोखने और उसे सही दिशा में बहाने का काम करते थे। लेकिन अंधाधुंध शहरीकरण के कारण इन प्राकृतिक जल निकायों को कंक्रीट और डामर की सड़कों से ढक दिया गया, जिससे पानी के जमीन में समाने का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गुरुग्राम को भविष्य में हर साल डूबने से बचाना है, तो प्रशासन को तुरंत जागना होगा।

इसके लिए प्राकृतिक जल निकासी तंत्र को फिर से जीवित करना, रेन वाटर मैनेजमेंट को प्राथमिकता देना और किसी भी नए विकास को शॉर्टकट के बजाय एक मजबूत, दीर्घकालिक मास्टर प्लान के तहत आगे बढ़ाना बेहद जरूरी है।