
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने किशोर-किशोरियों के आपसी सहमति वाले संबंधों में POCSO कानून के इस्तेमाल को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि कई मामलों में यह कानून उन परिस्थितियों में भी लगाया जा रहा है, जहां दोनों किशोर अपनी इच्छा से रिश्ते में होते हैं और बाद में परिवार की आपत्ति के चलते मामला दर्ज कराया जाता है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि यदि एक लड़का और लड़की अपनी मर्जी से घर छोड़कर चले जाते हैं, तो ऐसी परिस्थितियों को रोकने के लिए राज्य क्या कर सकता है। अदालत ने संकेत दिया कि POCSO कानून का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देना है, लेकिन इसका इस्तेमाल हर किशोर संबंध में एक समान तरीके से करना उचित नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कई मामलों में माता-पिता सामाजिक प्रतिष्ठा या पारिवारिक असहमति के कारण अपनी नाबालिग बेटी के रिश्ते के खिलाफ POCSO के तहत शिकायत दर्ज करा देते हैं। इससे ऐसे मामलों की संख्या बढ़ रही है, जिनमें आपसी सहमति वाले संबंध भी गंभीर आपराधिक मामलों में बदल जाते हैं।
इसी सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि स्कूलों और कॉलेजों के पाठ्यक्रम में जल्द ही व्यापक यौन शिक्षा को शामिल किया जाएगा। इसमें बच्चों को यौन शोषण, सहमति, POCSO कानून और सुरक्षित व्यवहार के बारे में जानकारी दी जाएगी, ताकि जागरूकता बढ़े और कानून के सही उद्देश्य को समझा जा सके।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट नहीं किया कि POCSO कानून में किसी प्रकार का तत्काल बदलाव किया जाएगा। फिलहाल अदालत इस विषय पर विभिन्न पक्षों की दलीलें सुन रही है और यह देख रही है कि बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए कानून के संभावित दुरुपयोग को कैसे रोका जा सकता है।






