लखनऊ/नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित परिसीमन और महिला आरक्षण के नए ढांचे के बीच उत्तर प्रदेश की संसदीय शक्ति में एक क्रांतिकारी बदलाव की संभावना दिख रही है। ताजा आंकड़ों और विशेषज्ञों के अनुमानों के अनुसार, आगामी परिसीमन प्रक्रिया के बाद उत्तर प्रदेश में लोकसभा सीटों की संख्या मौजूदा 80 से बढ़कर 140 तक पहुँच सकती है। यह विस्तार जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व को संतुलित करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इसी योजना के साथ 33 प्रतिशत महिला आरक्षण को 2029 के लोकसभा चुनावों से लागू करने की तैयारी भी की जा रही है, जिसके परिणाम स्वरूप अकेले उत्तर प्रदेश में ही लगभग 46 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी। यह न केवल महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाएगा बल्कि राज्य के सत्ता समीकरणों को भी पूरी तरह से बदल कर रख देगा।

प्रस्तावित नए ढांचे के अंतर्गत लोकसभा सीटों की कुल संख्या में देशव्यापी वृद्धि का प्रस्ताव है, जिसका सबसे बड़ा लाभ यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को मिलेगा। अनुमान है कि इस प्रक्रिया के बाद बिहार की सीटें 40 से बढ़कर 73 और मध्य प्रदेश की 29 से बढ़कर 51 तक हो सकती हैं। हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक गलियारों में मतभेद भी उभरने लगे हैं। जहाँ विपक्षी दल इसे संघीय ढांचे के संतुलन के लिए चुनौती मान रहे हैं, वहीं सरकार का तर्क है कि लोकतंत्र को मजबूत करने और हर नागरिक को समान प्रतिनिधित्व देने के लिए यह कदम अनिवार्य है। अंततः यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो भारतीय लोकतंत्र के केंद्र में उत्तर प्रदेश की भूमिका पहले से कहीं अधिक निर्णायक और शक्तिशाली हो जाएगी।